क्योंकि सर्वशक्तिमान के तीर मेरे अन्दर चुभे हैं6:4 सर्वशक्तिमान के तीर मेरे अन्दर चुभे हैं: अर्थात् मेरा कष्ट कम नहीं है। मेरी पीड़ा ऐसी है जैसी मनुष्य नहीं दे सकता।; और उनका विष मेरी आत्मा में पैठ गया है; परमेश्वर की भयंकर बात मेरे विरुद्ध पाँति बाँधे हैं।
“भला होता कि मुझे मुँह माँगा वर मिलता और जिस बात की मैं आशा करता हूँ वह परमेश्वर मुझे दे देता6:8 जिस बात की मैं आशा करता हूँ वह परमेश्वर मुझे दे देता: अर्थात् मृत्यु - वह उसकी आशा करता था, उसकी प्रतिक्षा करता था वह उस पल की अधीरता से बाट जोह रहा था।!
यही मेरी शान्ति का कारण; वरन् भारी पीड़ा में भी मैं इस कारण से उछल पड़ता; क्योंकि मैंने उस पवित्र के वचनों का कभी इन्कार नहीं किया।
परन्तु जब गरमी होने लगती तब उनकी धाराएँ लोप हो जाती हैं, और जब कड़ी धूप पड़ती है तब वे अपनी जगह से उड़ जाते हैं
“मुझे शिक्षा दो और मैं चुप रहूँगा6:24 मुझे शिक्षा दो और मैं चुप रहूँगा: मुझे सच्चा निर्देश दो या मुझे मेरा कर्त्तव्य बोध कराओ तो मैं शान्त हो जाऊँगा।; और मुझे समझाओ कि मैंने किस बात में चूक की है।