HINIRV

भजन संहिता 39:3

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मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर जल रहा था39:3 मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर जल रहा था: मेरा मन अधिकाधिक विचलित हो गया और मेरी भावनाएँ भी अधिकाधिक प्रबल हो गई। अपनी भावनाओं को दबाने का प्रयास किया तो वे अधिक प्रज्वलित हो गई।। सोचते-सोचते आग भड़क उठी; तब मैं अपनी जीभ से बोल उठा;

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