संकट के दिन मैं प्रभु की खोज में लगा रहा; रात को मेरा हाथ फैला रहा, और ढीला न हुआ, मुझ में शान्ति आई ही नहीं77:2 मुझ में शान्ति आई ही नहीं: मुझे शान्ति देनेवाली जितनी बातें मेरे मन में उभरी उन सब को मैंने त्याग दिया।।
मैं रात के समय अपने गीत को स्मरण करता; और मन में ध्यान करता हूँ, और मन में भली भाँति विचार करता हूँ:
मैं यहोवा के बड़े कामों की चर्चा करूँगा; निश्चय मैं तेरे प्राचीनकालवाले अद्भुत कामों को स्मरण करूँगा।
हे परमेश्वर, समुद्र ने तुझे देखा77:16 समुद्र ने तुझे देखा: लाल सागर और यरदन नदी।, समुद्र तुझे देखकर डर गया, गहरा सागर भी काँप उठा।
भजन संहिता 77 · KJV Audio
0:000:00