“मैं निश्चय जानता हूँ कि बात ऐसी ही है; परन्तु मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में कैसे धर्मी ठहर सकता है9:2 मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में कैसे धर्मी ठहर सकता है: अर्थात् परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य को पूर्ण पवित्र नहीं माना जा सकता है।?
वह तो पर्वतों को अचानक हटा देता है9:5 वह तो पर्वतों को अचानक हटा देता है: यहाँ पर्वतों को अचानक हटा देना। भूकम्प और प्राकृतिक आपदा का संदर्भ है। और उन्हें पता भी नहीं लगता, वह क्रोध में आकर उन्हें उलट-पुलट कर देता है।
वह तो ऐसे बड़े कर्म करता है, जिनकी थाह नहीं लगती; और इतने आश्चर्यकर्म करता है, जो गिने नहीं जा सकते।
देखो, वह मेरे सामने से होकर तो चलता है परन्तु मुझ को नहीं दिखाई पड़ता; और आगे को बढ़ जाता है, परन्तु मुझे सूझ ही नहीं पड़ता है।
देखो, जब वह छीनने लगे, तब उसको कौन रोकेगा9:12 जब वह छीनने लगे, तब उसको कौन रोकेगा: अर्थ स्पष्ट है। परमेश्वर हमारी सम्पदा को ले लेने का अधिकार रखता है। जब वह हम से कुछ लेता है तो वह वही लेता है, जो उसका ही है।? कौन उससे कह सकता है कि तू यह क्या करता है?
यदि सामर्थ्य की चर्चा हो, तो देखो, वह बलवान है और यदि न्याय की चर्चा हो, तो वह कहेगा मुझसे कौन मुकद्दमा लड़ेगा?
चाहे मैं निर्दोष ही क्यों न हूँ, परन्तु अपने ही मुँह से दोषी ठहरूँगा; खरा होने पर भी वह मुझे कुटिल ठहराएगा।
देश दुष्टों के हाथ में दिया गया है। परमेश्वर उसके न्यायियों की आँखों को मूँद देता है; इसका करनेवाला वही न हो तो कौन है?
“मेरे दिन हरकारे से भी अधिक वेग से चले जाते हैं; वे भागे जाते हैं और उनको कल्याण कुछ भी दिखाई नहीं देता।
तब मैं अपने सब दुःखों से डरता हूँ9:28 मैं अपने सब दुःखों से डरता हूँ: अय्यूब अपने दु:खों के निरंतरता से डर रहा है और उनके प्रति आँखें नहीं मूँद सकता है।। मैं तो जानता हूँ, कि तू मुझे निर्दोष न ठहराएगा।
क्योंकि परमेश्वर मेरे तुल्य मनुष्य नहीं है कि मैं उससे वाद-विवाद कर सकूँ, और हम दोनों एक दूसरे से मुकद्दमा लड़ सके।