वह धर्मियों से अपनी आँखें नहीं फेरता36:7 वह धर्मियों से अपनी आँखें नहीं फेरता: वह लगातार उन पर दृष्टि लगाए रहता है कि उनका जीवन किस स्तर पर है- अधिक ऊँचे या नीचे स्तर पर।, वरन् उनको राजाओं के संग सदा के लिये सिंहासन पर बैठाता है, और वे ऊँचे पद को प्राप्त करते हैं।
वह उनके कान शिक्षा सुनने के लिये खोलता है36:10 वह उनके कान शिक्षा सुनने के लिये खोलता है: वह उन्हें कष्टों द्वारा मिलनेवाली शिक्षा सुनने या सीखने के लिए इच्छुक बनाता है।, और आज्ञा देता है कि वे बुराई से दूर रहें।
परन्तु वह तुझको भी क्लेश के मुँह में से निकालकर ऐसे चौड़े स्थान में जहाँ सकेती नहीं है, पहुँचा देता है, और चिकना-चिकना भोजन तेरी मेज पर परोसता है।
उस रात की अभिलाषा न कर36:20 उस रात की अभिलाषा न कर: स्पष्टतः मृत्यु की रात।, जिसमें देश-देश के लोग अपने-अपने स्थान से मिटाएँ जाते हैं।